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mahabharat 13.147.52: जो मनुष्य बारह वर्ष तक व्रत का व्रत लेकर और स्वयं रहकर अग्नि में अपने शरीर की आहुति देता है, वह अग्निलोक में सम्मान प्राप्त करता है ॥ 52॥   |   mahabharat अध्याय 13.147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.147.52 
आत्मानमुपजीवन् यो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम्।
हुत्वाग्नौ देहमुत्सृज्य वह्निलोके महीयते॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य बारह वर्ष तक व्रत का व्रत लेकर और स्वयं रहकर अग्नि में अपने शरीर की आहुति देता है, वह अग्निलोक में सम्मान प्राप्त करता है ॥ 52॥
 
He who, having taken initiation in the vows of fasting for twelve years and living on his own, sacrifices his body in the fire, attains respect in the world of fire. ॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)