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mahabharat 13.147.42: जो वायु, जल, फल या मूल खाकर जीवनयापन करता है, वह यक्षों पर अपना आधिपत्य स्थापित करता है और अप्सराओं का संग करता है ॥42॥   |   mahabharat अध्याय 13.147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.147.42 
वायुभक्षोऽम्बुभक्षो वा फलमूलाशनोऽपि वा।
यक्षेष्वैश्वर्यमाधाय मोदतेऽप्सरसां गणै:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जो वायु, जल, फल या मूल खाकर जीवनयापन करता है, वह यक्षों पर अपना आधिपत्य स्थापित करता है और अप्सराओं का संग करता है ॥42॥
 
He who lives by eating air, water, fruits or roots, establishes his supremacy over the Yakshas and enjoys the company of the Apsaras. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)