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mahabharat 13.147.41: जो मुनि व्रत का पालन करता है, केवल सेज या घिसे हुए पत्ते खाता है और शीतकाल में प्रतिदिन शीत के कष्टों को सहन करता है, वह परम मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 13.147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.147.41 
शैवालं शीर्णपर्णं वा तद्‍व्रती यो निषेवते।
शीतयोगवहो नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
जो मुनि व्रत का पालन करता है, केवल सेज या घिसे हुए पत्ते खाता है और शीतकाल में प्रतिदिन शीत के कष्टों को सहन करता है, वह परम मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ 41॥
 
The sage who observes fasts and eats only sedge or worn-out leaves and endures the hardships of cold every day during winter, attains the ultimate salvation. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)