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श्लोक  13.146.d83-d84 
शुश्रूषन्ते ये पितरं मातरं च गृहाश्रमे॥
भर्तारं चैव या नारी अग्निहोत्रं च ये द्विजा:।
तेषु तेषु च प्रीणन्ति देवा इन्द्रपुरोगमा:॥
पितर: पितृलोकस्था: स्वधर्मेण स रज्यते।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य गृहस्थ जीवन में रहकर माता-पिता की सेवा करते हैं, जो स्त्रियाँ अपने पति की सेवा करती हैं तथा जो ब्राह्मण नियमित रूप से अग्निहोत्र अनुष्ठान करते हैं, उनसे इन्द्र आदि देवता तथा पितृलोक में रहने वाले पितर प्रसन्न होते हैं तथा वह मनुष्य अपने धर्म से प्रसन्न होता है।
 
Those who live in the household and serve their parents, the women who serve their husbands and the Brahmins who perform Agnihotra rituals regularly, gods like Indra and the ancestors residing in the ancestral world are pleased with them and that man is happy with his religion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)