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श्लोक  13.146.d5-d6 
उमोवाच
नीलकण्ठ नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखावह॥
बहूनामायुधानां त्वं पिनाकं धर्तुमिच्छसि।
किमर्थं देवदेवेश तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने पूछा- हे समस्त लोकों को सुख देने वाले नीलकंठ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे देवराज! इतने अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होने पर भी आप केवल पिनाक ही क्यों धारण करना चाहते हैं? कृपया मुझे यह बताइए।
 
He asked- O Neelkanth, who gives happiness to all the worlds! I salute you. O Lord of the Gods! Despite having so many weapons, why do you want to wear only Pinaka? Please tell me this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)