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श्लोक  13.146.d100-d102 
मार्जारा मूषिका: श्वान: सूकराश्च शुकास्तथा।
कपोतका कर्कटका: सरीसृपनिषेवणा:॥
अरण्यवासिनश्चान्ये सङ्घा ये मृगपक्षिणाम्।
एवं बहुविधा देवि लोकेऽस्मिन् सचराचरा:॥
गृहे क्षेत्रे बिले चैव शतशोऽथ सहस्रश:।
गृहस्थेन कृतं कर्म सर्वैस्तैरिह भुज्यते॥
 
 
अनुवाद
देवी! चूहे, बिल्ली, कुत्ते, सूअर, तोते, कबूतर, कौवे, सरीसृप - ये तथा अन्य अनेक पशु-पक्षी वनवासी हैं। इसी प्रकार इस संसार में घरों, खेतों और बिलों में रहने वाले नाना प्रकार के सैकड़ों-हजारों जीव-जंतु भी यहाँ गृहस्थ द्वारा किए गए कर्मों का फल भोगते हैं।
 
Devi! Rats, cats, dogs, pigs, parrots, pigeons, crows, reptiles - these and many other animals and birds are forest dwellers. Similarly, hundreds and thousands of living creatures of various kinds who live in houses, fields and burrows in this world, all of them suffer the consequences of the deeds done by the householder here.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)