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mahabharat 13.146.83: मुमुक्षुको को केवल अध्यात्मज्ञान का ही चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए। उसी में सदैव स्थित रहना चाहिए। निरन्तर योगाभ्यास में संलग्न रहना चाहिए और तत्त्व का चिन्तन करते रहना चाहिए। 83॥   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.146.83 
अध्यात्मगतिचित्तो यस्तन्मनास्तत्परायण:।
युक्तो योगं प्रति सदा प्रतिसंख्यानमेव च॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
मुमुक्षुको को केवल अध्यात्मज्ञान का ही चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए। उसी में सदैव स्थित रहना चाहिए। निरन्तर योगाभ्यास में संलग्न रहना चाहिए और तत्त्व का चिन्तन करते रहना चाहिए। 83॥
 
Mumukshuko should think, meditate and do Nididhyasan only on spiritual knowledge. He should always remain situated in it. One should continuously engage in yoga practice and keep thinking about Tattva. 83॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)