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mahabharat 13.146.113-115: जब गृहस्थों के रसोईघर से धुआँ निकलना बन्द हो जाए, मूसल से चावल कूटने की आवाज न आए, सन्नाटा छा जाए, चूल्हे की आग बुझ जाए, घर में सब लोग भोजन कर लें, बर्तनों का हिलना बन्द हो जाए और भिखारी भीख मांगकर लौट जाएं, तब तक मुनि को अतिथियों की सेवा करनी चाहिए और बचा हुआ भोजन स्वयं खा लेना चाहिए। ऐसा करने से सच्चे धर्म में प्रीति रखने वाला शान्त पुरुष मुनि धर्म से युक्त हो जाता है, अर्थात् उसे मुनि धर्म के पालन का फल मिलता है। जो अभिमानी और अहंकारी नहीं है, जो अप्रसन्न और आश्चर्यचकित नहीं होता, जो शत्रु और मित्र को समान समझता है और सबके प्रति मैत्री का भाव रखता है, वही धर्म के विद्वानों में श्रेष्ठ मुनि है।।113-115।।   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.146.113-115 
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने।
अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके॥ ११३॥
अतिथिं काङ्क्षमाणो वै शेषान्नकृतभोजन:।
सत्यधर्मरत: शान्तो मुनिधर्मेण युज्यते॥ ११४॥
न स्तम्भी न च मानी स्यान्नाप्रसन्नो न विस्मित:।
मित्रामित्रसमो मैत्रो य: स धर्मविदुत्तम:॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
जब गृहस्थों के रसोईघर से धुआँ निकलना बन्द हो जाए, मूसल से चावल कूटने की आवाज न आए, सन्नाटा छा जाए, चूल्हे की आग बुझ जाए, घर में सब लोग भोजन कर लें, बर्तनों का हिलना बन्द हो जाए और भिखारी भीख मांगकर लौट जाएं, तब तक मुनि को अतिथियों की सेवा करनी चाहिए और बचा हुआ भोजन स्वयं खा लेना चाहिए। ऐसा करने से सच्चे धर्म में प्रीति रखने वाला शान्त पुरुष मुनि धर्म से युक्त हो जाता है, अर्थात् उसे मुनि धर्म के पालन का फल मिलता है। जो अभिमानी और अहंकारी नहीं है, जो अप्रसन्न और आश्चर्यचकित नहीं होता, जो शत्रु और मित्र को समान समझता है और सबके प्रति मैत्री का भाव रखता है, वही धर्म के विद्वानों में श्रेष्ठ मुनि है।।113-115।।
 
When the smoke from the kitchen of the householders stops coming out, the sound of pounding rice with the pestle does not come, there is silence, the fire in the stove is extinguished, everyone in the house has eaten, the movement of utensils stops and the beggars have returned after begging, till then the sage should wait on the guests and eat the leftover food himself. By doing this, a calm person having love for true religion becomes endowed with the religion of a sage, that is, he gets the result of following the religion of a sage. He who is not proud and arrogant, who is not displeased and surprised, who considers the enemy and friend alike and has a feeling of friendship towards everyone, he is the best sage among the scholars of religion. 113-115.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४१॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २२१ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)