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mahabharat 13.145.d4: श्री महेश्वर बोले- धर्म को जानने वाली और मधुर वचन बोलने वाली देवी! आपने जो संदेह किया है, वह उचित ही है। प्रिये! आपके अतिरिक्त अन्य कोई मुझसे ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता।   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक d4
 
 
श्लोक  13.145.d4 
श्रीमहेश्वर उवाच
(स्थाने संशयितुं देवि धर्मज्ञे प्रियभाषिणी॥
त्वदृते मां हि वै प्रष्टुं न शक्यं केनचित् प्रिये।
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- धर्म को जानने वाली और मधुर वचन बोलने वाली देवी! आपने जो संदेह किया है, वह उचित ही है। प्रिये! आपके अतिरिक्त अन्य कोई मुझसे ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता।
 
Shri Maheshwar said- Goddess who knows the religion and speaks sweet words! The doubt you have raised is justified. Dear! No one else except you can ask me such a question.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)