श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक d3
 
 
श्लोक  13.145.d3 
नारद उवाच
एवमुक्तस्तथा देव्या प्रीयमाणोऽब्रवीद् भव:॥ )
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं- देवी पार्वती की यह बात सुनकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और बोले।
 
Naradji says-On hearing Goddess Parvati say this, Lord Shankar became happy and said.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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