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mahabharat 13.145.d2: हे प्रभु! मेरे मन में यह शंका है। कृपया इसका समाधान करें। मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  13.145.d2 
(एष मे संशयो देव हृदि मे सम्प्रवर्तते।
देवदेव नमस्तुभ्यं तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मेरे मन में यह शंका है। कृपया इसका समाधान करें। मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ।
 
O Lord! I have this doubt in my heart. Please resolve it. I offer my respectful obeisances unto you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)