श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.145.50 
भीष्म उवाच
एवमुक्त: स भगवान‍् शैलपुत्र्या पिनाकधृत्।
तस्या धृत्या च बुद्‍ध्या च प्रीतिमानभवत् प्रभु:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन ! जब गिरिराजकुमारी उमा ने इस प्रकार पूछा, तब पिनाकधारी भगवान शिव उनके धैर्य और बुद्धिमता से अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥50॥
 
Bhishmaji says – King! When Girirajkumari Uma asked in this manner, Pinakadhari Lord Shiva was very pleased with her patience and wisdom. 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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