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mahabharat 13.145.48: हे प्रभु! आपके हाथ में सदैव पिनाक क्यों रहता है? आप सदैव जटाधारी ब्रह्मचारी का वेश क्यों धारण किए रहते हैं?॥ 48॥   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.145.48 
हस्ते देव पिनाकं ते सततं केन तिष्ठति।
जटिलो ब्रह्मचारी च किमर्थमसि नित्यदा॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! आपके हाथ में सदैव पिनाक क्यों रहता है? आप सदैव जटाधारी ब्रह्मचारी का वेश क्यों धारण किए रहते हैं?॥ 48॥
 
O lord! Why is Pinaka always present in your hand? Why do you always remain in the guise of a brahmacari with matted hair?॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)