श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.145.45 
तस्य चाक्ष्णो महत् तेजो येनायं मथितो गिरि:।
त्वत्प्रियार्थं च मे देवि प्रकृतिस्थ: पुन: कृत:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
उस तीसरे नेत्र के महान तेज से ही इस पर्वत का मंथन हुआ था। हे देवि! आपकी प्रसन्नता के लिए मैंने इस पर्वत को पुनः हिमवान बना दिया है।॥45॥
 
It was the great brilliance of that third eye which churned this mountain. O Goddess! To please you, I have again made this mountain Himavan natural. ॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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