श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  13.145.40 
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश शूलपाणे महाव्रत।
संशयो मे महान् जातस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
उमा बोलीं- हे प्रभु! समस्त देवताओं के स्वामी! शूलपाणे! महान व्रतधारी महेश्वर! मेरे मन में एक महान् संशय उत्पन्न हो गया है। आप मुझे उसका स्पष्टीकरण दीजिए।
 
Uma said-Lord! Lord of all Gods! Shulpane! Great fasting Maheshwar! A great doubt has arisen in my mind. You explain it to me.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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