श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.145.4 
तत्र देवो मुदा युक्तो भूतसंघशतैर्वृत:।
नानारूपैर्विरूपैश्च दिव्यैरद्भुतदर्शनै:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उस स्थान पर महादेव जी सैकड़ों भूतों से घिरे हुए अत्यंत प्रसन्न होते थे। उन भूतों के रूप विविध और विकृत थे, उनमें से कुछ के रूप दिव्य और अद्भुत प्रतीत होते थे॥4॥
 
At that place Mahadev Ji used to feel very happy being surrounded by hundreds of ghosts. The forms of those ghosts were various and distorted, the forms of some of them looked divine and amazing. ॥4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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