श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.145.35 
क्षणेन तेन निर्दग्धो हिमवानभवन्नग:।
सधातुशिखराभोगो दीप्तदग्धलतौषधि:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
क्षण भर में उसने हिमालय को उसकी धातुओं और विशाल चोटियों समेत जला डाला। उसकी लताएँ और औषधियाँ जलकर राख हो गईं।
 
In a moment he burnt down the Himalayas along with their metals and huge peaks. Its creepers and medicinal herbs ignited and were reduced to ashes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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