श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.145.33 
मृगयूथैर्द्रुतैर्भीतैर्हरपार्श्वमुपागतै:।
शरणं चाप्यविन्दद्भिस्तत् सद: संकुलं बभौ॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जब भयभीत मृगों के समूह को कहीं भी आश्रय न मिला, तब वे दौड़कर महादेवजी के पास आए। सारा सभास्थल उनसे भर गया और अत्यंत शोभायमान होने लगा॥33॥
 
When the herds of frightened deer could not find shelter anywhere, they came running to Mahadevji. The entire assembly place got filled with them and it started looking extremely beautiful. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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