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mahabharat 13.145.32: वह सुन्दर वन, जो साल और सरल आदि वृक्षों से युक्त था, उत्तम चन्दन के वृक्षों से सुशोभित था और दिव्य औषधियों से प्रकाशित था, सब ओर से जलकर राख हो गया। 32।   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.145.32 
दह्यमाने वने तस्मिन् ससालसरलद्रुमे।
सचन्दनवरे रम्ये दिव्यौषधिविदीपिते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वह सुन्दर वन, जो साल और सरल आदि वृक्षों से युक्त था, उत्तम चन्दन के वृक्षों से सुशोभित था और दिव्य औषधियों से प्रकाशित था, सब ओर से जलकर राख हो गया। 32।
 
That beautiful forest, which was full of trees like Sal and Saral, decorated with the best sandalwood tree and illuminated by divine medicinal herbs, caught fire and was burning from all sides. 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)