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mahabharat 13.145.21-22h: भगवान भूतनाथ का वह भयानक स्थान अत्यंत सुंदर लग रहा था। वह अत्यंत भयानक था और विशाल सर्पों से भरा हुआ था।   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  13.145.21-22h 
तस्य भूतपते: स्थानं भीमरूपधरं बभौ॥ २१॥
अप्रधृष्यतरं चैव महोरगसमाकुलम्।
 
 
अनुवाद
भगवान भूतनाथ का वह भयानक स्थान अत्यंत सुंदर लग रहा था। वह अत्यंत भयानक था और विशाल सर्पों से भरा हुआ था।
 
That dreadful place of Lord Bhootnath was looking very beautiful. It was extremely dreadful and was filled with huge serpents. 21 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)