श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 20-d1
 
 
श्लोक  13.145.20-d1 
दृष्ट्वा महर्षय: सर्वे शिरोभिरवनिं गता:॥ २०॥
(गीर्भि: परमशुद्धाभिस्तुष्टुवुश्च मनोहरम्॥ )
विमुक्ता: सर्वपापेभ्य: क्षान्ता विगतकल्मषा:।
 
 
अनुवाद
भगवान शंकर को देखकर उन सभी महर्षियों ने पृथ्वी पर सिर झुकाकर शुद्ध वचनों से उनकी स्तुति की। वे सभी महर्षि सभी पापों से मुक्त, क्षमाशील और निष्पाप थे।
 
After seeing Lord Shankar, all those great sages bowed their heads on the earth and praised him with pure words. All those sages were free from all sins, forgiving and sinless.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas