श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 18-20h
 
 
श्लोक  13.145.18-20h 
व्याघ्रचर्माम्बरधर: सिंहचर्मोत्तरच्छद:॥ १८॥
व्यालयज्ञोपवीती च लोहिताङ्गदभूषण:।
हरिश्मश्रुर्जटी भीमो भयकर्ता सुरद्विषाम्॥ १९॥
अभय: सर्वभूतानां भक्तानां वृषभध्वज:।
 
 
अनुवाद
वे बाघ की खाल को वस्त्र के रूप में धारण करते थे। सिंह की खाल उनका ऊपरी वस्त्र (चादर) थी। उनके गले में सर्पों से बना पवित्र धागा सुशोभित था। वे लाल बाजूबंदों से सुशोभित थे। उनकी मूँछें काली थीं और सिर पर जटाएँ सुशोभित थीं। वे विशाल रुद्र देवताओं के शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करते थे। अपनी ध्वजा पर वृषभ का चिह्न धारण करके वे भगवान शिव के भक्तों और सभी भूतों का भय दूर करते थे।
 
He wore tiger skin as his clothes. Lion skin served as his upper garment (sheet). A sacred thread made of snakes adorned his neck. He was adorned with red armlets. His moustache was black and matted hair adorned his head. The gigantic Rudra used to instill fear in the hearts of the enemies of the gods. Wearing the symbol of a bull on his flag, he used to dispel the fear of the devotees of Lord Shiva and all the ghosts. 18-19 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)