श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 13-15h
 
 
श्लोक  13.145.13-15h 
मुनयश्च महाभागा: सिद्धाश्चैवोर्ध्वरेतस:॥ १३॥
मरुतो वसव: साध्या विश्वेदेवा: सवासवा:।
यक्षा नागा: पिशाचाश्च लोकपाला हुताशना:॥ १४॥
वाता: सर्वे महाभूतास्तत्रैवासन् समागता:।
 
 
अनुवाद
महान् भाग्यशाली ऋषिगण, ऊर्ध्वरेता सिद्धगण, मरुद्गण, वसुगण, साध्यगण, इन्द्र सहित विश्वेदेव, यक्ष और नाग, पिशाच, लोकपाल, अग्नि, समस्त वायु और प्रमुख भूतगण वहाँ आ गये थे।
 
The great fortunate sages, the Urdhvareta Siddhas, the Marudgans, the Vasugans, the Sadhyagans, the Vishvedevs including Indra, the Yakshas and the Nagas, the vampires, the Lokpal, Agni, all the winds and the principal ghosts had come there. 13-14 1/2"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)