श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  13.145.12-13h 
षट्पदैरुपगीतैश्च माधवाप्रतिमो गिरि:।
तन्महोत्सवसंकाशं भीमरूपधरं तत:॥ १२॥
दृष्ट्वा मुनिगणस्यासीत् परा प्रीतिर्जनार्दन।
 
 
अनुवाद
माधव! वह अद्वितीय पर्वत मधुमक्खियों के गान से अत्यंत सुंदर लग रहा था। जनार्दन! यद्यपि वह स्थान अत्यंत भयावह था, फिर भी ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह किसी महान उत्सव से परिपूर्ण हो। उसे देखकर ऋषियों का समूह अत्यंत प्रसन्न हुआ।
 
Madhava! That unique mountain was looking very beautiful with the songs of the bees. Janardan! Even though that place was very scary, it seemed as if it was full of a great festival. Seeing it, the group of sages became very happy.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)