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mahabharat 13.144.18: उस समय नाना प्रकार के प्राणियों का हाहाकार चारों ओर फैल रहा था, मानो पर्वत का अचेत शिखर स्वयं ही विलाप कर रहा हो। उस तेज से जल जाने के कारण पर्वत का शिखर अत्यंत दयनीय लग रहा था॥18॥   |   mahabharat अध्याय 13.144: तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.144.18 
मृगैश्च विविधाकारैर्हाहाभूतमचेतनम्।
शिखरं तस्य शैलस्य मथितं दीनदर्शनम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उस समय नाना प्रकार के प्राणियों का हाहाकार चारों ओर फैल रहा था, मानो पर्वत का अचेत शिखर स्वयं ही विलाप कर रहा हो। उस तेज से जल जाने के कारण पर्वत का शिखर अत्यंत दयनीय लग रहा था॥18॥
 
At that time the wailing of various kinds of creatures was spreading all around, as if the unconscious peak of the mountain was itself wailing. Due to being burnt by that radiance, the peak of the mountain looked very pitiable.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)