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mahabharat 13.144.16-17: तदनन्तर भगवान नारायण का तेजस्वी और चमत्कारी कर्म, व्रतरूपी ईधन से प्रज्वलित होकर श्रीकृष्ण के मुख से निकलकर अग्निरूप में प्रकट हुआ और वृक्षों, लताओं, झाड़ियों, पक्षियों, मृग समुदाय, हिंसक पशुओं और सर्पों सहित उस पर्वत को जलाने लगा॥16-17॥   |   mahabharat अध्याय 13.144: तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.144.16-17 
ततो नारायणं तेजो व्रतचर्येन्धनोत्थितम्।
वक्त्रान्नि:सृत्य कृष्णस्य वह्निरद्भुतकर्मण:॥ १६॥
सोऽग्निर्ददाह तं शैलं सद्रुमं सलताक्षुपम्।
सपक्षिमृगसंघातं सश्वापदसरीसृपम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर भगवान नारायण का तेजस्वी और चमत्कारी कर्म, व्रतरूपी ईधन से प्रज्वलित होकर श्रीकृष्ण के मुख से निकलकर अग्निरूप में प्रकट हुआ और वृक्षों, लताओं, झाड़ियों, पक्षियों, मृग समुदाय, हिंसक पशुओं और सर्पों सहित उस पर्वत को जलाने लगा॥16-17॥
 
Thereafter, Lord Narayana's bright and miraculous Karma, ignited with the fuel of fasting, emerged from the mouth of Shri Krishna and appeared in the form of fire and started burning that mountain along with trees, creepers, bushes, birds, deer community, predatory animals and snakes. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)