श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.141.11 
क्षेत्रप्रतिग्रहे चैव ग्रहसूतकयोस्तथा।
त्रीणि रात्राण्युपोषित्वा तेन पापाद् विमुच्यते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
*यदि कोई ग्रहणकाल में या अशुद्धि काल में खेत का दान करता है, तो तीन रात्रि उपवास करने से वह पाप से मुक्त हो जाता है।॥11॥
 
*If one accepts a field as donation during an eclipse or in a period of impurity, one is relieved of the sin by fasting for three nights.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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