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mahabharat 13.140.18: जो ब्राह्मण ऐसा अन्न खाता है, वह रोगी हो जाता है और शीघ्र ही उसका सम्पूर्ण कुल नष्ट हो जाता है। जो नगर रक्षक का अन्न खाता है, वह चाण्डाल के समान है।   |   mahabharat अध्याय 13.140: जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्योंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.140.18 
व्याधिं कुलक्षयं चैव क्षिप्रं प्राप्नोति ब्राह्मण:।
नगरीरक्षिणो भुङ्‍‍क्ते श्वपचप्रवणो भवेत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण ऐसा अन्न खाता है, वह रोगी हो जाता है और शीघ्र ही उसका सम्पूर्ण कुल नष्ट हो जाता है। जो नगर रक्षक का अन्न खाता है, वह चाण्डाल के समान है।
 
A Brahmin who eats such food becomes ill and soon his entire family is destroyed. He who eats the food of a city guard is like a Chandala. 18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)