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mahabharat 13.14.d94-d95: जो शुद्ध, नित्य, ध्रुव, भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी, शिवस्वरूप और मंगलमय स्वरूप, कल्याण के मूल, शिव के मूल और भगवान शिव में सबसे अधिक पूजनीय हैं, उन नारायणदेव को नमस्कार है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d94-d95
 
 
श्लोक  13.14.d94-d95 
नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च॥
भूतभव्यभवेशाय शिवाय शिवमूर्तये।
शिवयोने: शिवाद्याय शिवपूज्यतमाय च॥
 
 
अनुवाद
जो शुद्ध, नित्य, ध्रुव, भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी, शिवस्वरूप और मंगलमय स्वरूप, कल्याण के मूल, शिव के मूल और भगवान शिव में सबसे अधिक पूजनीय हैं, उन नारायणदेव को नमस्कार है।
 
Salutations to Narayanadev, who is pure, eternal, pole, master of past, present and future, form of Shiva and auspicious embodiment, origin of welfare, origin of Shiva and most worshipable of Lord Shiva.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)