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mahabharat 13.14.d89: इन अग्नियों के पास मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के विद्वानों की सुन्दर, मधुर वाणी सुनी, जो अक्षरों का स्पष्ट उच्चारण कर रहे थे और उनके प्रभाव से अदृश्य हो रहे थे। उनके श्लोक और अक्षर अत्यंत सुन्दरता से उच्चारित हो रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.14.d89 
एषु चाग्निसमीपेषु शुश्राव सुपदाक्षरा:॥
प्रभावान्तरितानां तु प्रस्पष्टाक्षरभाषिणाम्।
ऋग्यजु:सामगानां च मधुरा: सुस्वरा गिर:।
 
 
अनुवाद
इन अग्नियों के पास मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के विद्वानों की सुन्दर, मधुर वाणी सुनी, जो अक्षरों का स्पष्ट उच्चारण कर रहे थे और उनके प्रभाव से अदृश्य हो रहे थे। उनके श्लोक और अक्षर अत्यंत सुन्दरता से उच्चारित हो रहे थे।
 
Near these fires, I heard the beautiful, sweet voices of the scholars of Rigveda, Yajurveda and Samveda, who pronounced the letters clearly and remained invisible due to their influence. His verses and letters were being pronounced very beautifully.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)