Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.14.d74: जो आसक्ति और अहंकार से रहित हैं तथा कामनाओं के बंधन से मुक्त हैं, वही मुझे जान सकते हैं। हे पक्षीश्रेष्ठ! तुम मेरे भक्त हो और सदैव मुझमें ही अपना मन लगाए रहते हो। अतः तुम मेरे उस स्थूल रूप को समझोगे जो जगत के कारण रूप में स्थित है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d74
 
 
श्लोक  13.14.d74 
निर्ममा निरहङ्कारा निराशीर्बन्धनायुता:।
भवांस्तु सततं भक्तो मन्मना: पक्षिसत्तम॥
स्थूलं मां वेत्स्यसे तस्माज्जगत: कारणे स्थितम्।
 
 
अनुवाद
जो आसक्ति और अहंकार से रहित हैं तथा कामनाओं के बंधन से मुक्त हैं, वही मुझे जान सकते हैं। हे पक्षीश्रेष्ठ! तुम मेरे भक्त हो और सदैव मुझमें ही अपना मन लगाए रहते हो। अतः तुम मेरे उस स्थूल रूप को समझोगे जो जगत के कारण रूप में स्थित है।
 
Only those who are devoid of attachment and ego and are free from the bondage of desires can know me. O great bird! You are my devotee and always keep your mind focused on me. Therefore, you will understand my gross form which is situated as the cause of the world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)