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mahabharat 13.14.d73: विनतानंदन! मेरे स्वरूप को कोई भी किसी भी प्रकार से पूर्णतः नहीं जान सकता। केवल विद्वान् ही मेरे विषय में कुछ जान सकते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d73
 
 
श्लोक  13.14.d73 
वैनतेय न कस्यापि अहं वेद्य: कथंचन।
मां हि विन्दन्ति विद्वांसो ये ज्ञाने परिनिष्ठिता:॥
 
 
अनुवाद
विनतानंदन! मेरे स्वरूप को कोई भी किसी भी प्रकार से पूर्णतः नहीं जान सकता। केवल विद्वान् ही मेरे विषय में कुछ जान सकते हैं।
 
Vinatanandan! No one can have complete knowledge of my nature in any way. Only the learned ones can know something about me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)