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mahabharat 13.14.d66-d67: ऐसा करते ही मेरा हृदय भगवान नारायण के दर्शन की इच्छा से स्थिर हो गया और मैं मन और वायु के समान वेगवान होकर महान वेग का आश्रय लेकर सुन्दर बद्री विशाल तीर्थ पर भगवान नारायण के आश्रम में पहुँच गया।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d66-d67
 
 
श्लोक  13.14.d66-d67 
धृतं बभूव हृदयं नारायणदिदृक्षया॥
सोऽहं वेगं समास्थाय मनोमारुतवेगवान्।
रम्यां विशालां बदरीं गतो नारायणाश्रमम्॥
 
 
अनुवाद
ऐसा करते ही मेरा हृदय भगवान नारायण के दर्शन की इच्छा से स्थिर हो गया और मैं मन और वायु के समान वेगवान होकर महान वेग का आश्रय लेकर सुन्दर बद्री विशाल तीर्थ पर भगवान नारायण के आश्रम में पहुँच गया।
 
By doing so, my heart became stable with the desire to see Lord Narayana and becoming as swift as the mind and the wind, taking shelter of great speed, I reached the ashram of Lord Narayana at the beautiful Badri Vishal pilgrimage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)