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mahabharat 13.14.d51: फिर मैंने हाथ जोड़कर शुद्ध हृदय से सिर झुकाकर उन सर्वव्यापी परमेश्वर, भगवान परमपुरुष को, जिन्होंने उपर्युक्त बात कही थी, प्रणाम किया और यह कहा -   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d51
 
 
श्लोक  13.14.d51 
तमब्रवं देवदेवं मामेवं वादिनं परम्।
प्रयत: प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणम्य शिरसा विभुम्॥
 
 
अनुवाद
फिर मैंने हाथ जोड़कर शुद्ध हृदय से सिर झुकाकर उन सर्वव्यापी परमेश्वर, भगवान परमपुरुष को, जिन्होंने उपर्युक्त बात कही थी, प्रणाम किया और यह कहा -
 
Then, with folded hands and pure heart, I bowed my head and saluted the omnipresent God, Lord Param Purush, who had said the above mentioned thing, and said this -
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)