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mahabharat 13.14.d46: आकाशवाणी हुई, "हे श्रेष्ठ व्रत करने वाले विनतन के पुत्र! मैं तुम्हारे पराक्रम से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मेरी बात व्यर्थ न जाए; इसलिए बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ?"   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.14.d46 
अशरीरिणी वागुवाच
प्रीतोऽस्मि ते वैनतेय कर्मणानेन सुव्रत।
अवृथा तेऽस्तु मद्वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते॥
 
 
अनुवाद
आकाशवाणी हुई, "हे श्रेष्ठ व्रत करने वाले विनतन के पुत्र! मैं तुम्हारे पराक्रम से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मेरी बात व्यर्थ न जाए; इसलिए बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ?"
 
A voice from the sky said, "O son of Vinatan, who observes the best fast! I am very pleased with your valour. My words should not go in vain; therefore tell me, which of your wishes should I fulfill?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)