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mahabharat 13.14.d33: ऋषि बोले - विनतानंदन! रोग और शोक से रहित वर देने वाले देवता महात्मा नारायण कहाँ से प्रकट हुए? और वे वास्तव में कौन हैं?   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.14.d33 
ऋषय ऊचु:
देवदेवं महात्मानं नारायणमनामयम्।
भवानुपास्ते वरदं कुतोऽसौ कश्च तत्त्वत:॥
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले - विनतानंदन! रोग और शोक से रहित वर देने वाले देवता महात्मा नारायण कहाँ से प्रकट हुए? और वे वास्तव में कौन हैं?
 
The sage said - Vinatanandan! Where did Mahatma Narayan, the boon-giving deity who is free from disease and sorrow, appear from? And who is he really?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)