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mahabharat 13.14.d201: जो लोग अग्निहोत्र करने में तत्पर रहते हैं, जप-यज्ञ में लगे रहते हैं और इच्छाओं के बंधन से मुक्त रहते हैं, वे अविनाशी ईश्वर के स्वरूप को प्राप्त होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.14.d201 
तदग्निहोत्रपरमा जपयज्ञपरायणा:॥
निराशीर्बन्धना: सन्त: प्रयान्त्यक्षरसात्मताम्।
 
 
अनुवाद
जो लोग अग्निहोत्र करने में तत्पर रहते हैं, जप-यज्ञ में लगे रहते हैं और इच्छाओं के बंधन से मुक्त रहते हैं, वे अविनाशी ईश्वर के स्वरूप को प्राप्त होते हैं।
 
Those who are ready to perform Agnihotra, engage in Japa-Yagya and are free from the bondage of desires, attain the form of the immortal God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)