Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.14.d165: जिनकी बुद्धि सत्त्वगुण से परिपूर्ण है और केवल आत्मा के तत्व का ही चिन्तन करने में लगी रहती है, वे अविनाशी परमात्मा को अपने स्वरूप में देखते हैं। | mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सत्त्वयुक्ता मतिर्येषां केवलात्मविनिश्चिता॥
ते पश्यन्ति स्वमात्मानं परमात्मानमव्ययम्।
अनुवाद
जिनकी बुद्धि सत्त्वगुण से परिपूर्ण है और केवल आत्मा के तत्व का ही चिन्तन करने में लगी रहती है, वे अविनाशी परमात्मा को अपने स्वरूप में देखते हैं।
Those whose intellect is full of Sattva Guna and is engaged in thinking only about the essence of the Self, they see the imperishable Supreme Soul in the form of their Self.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥