Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.14.d159: मेरा चौथा आत्म-सिद्ध रूप, जो अपनी माया से दुष्टों को मोहित करके उनका नाश करता है, नियम से रहता है तथा जगत की रक्षा और वृद्धि करता है। गरुड़! वह मैं हूँ। | mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
क्षिपन्ती मोहयन्ती च ह्यात्मनिष्ठा स्वमायया।
चतुर्थी मे महामूर्तिर्जगद्वृद्धिं ददाति सा॥
रक्षते चापि नियता सोऽहमस्मि नभश्चर।
अनुवाद
मेरा चौथा आत्म-सिद्ध रूप, जो अपनी माया से दुष्टों को मोहित करके उनका नाश करता है, नियम से रहता है तथा जगत की रक्षा और वृद्धि करता है। गरुड़! वह मैं हूँ।
My fourth self-realized form, which enchants and destroys the wicked with its illusion, lives according to rules and protects and develops the world. Garuda! That is me.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥