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mahabharat 13.14.d107-d108: मैं भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूँ, जो पुनर्वसु नामक नक्षत्र से उत्पन्न हुए हैं और प्रत्येक प्राणी के उत्पत्ति स्थान हैं, जिनके नाम और रूप वषट्कार, स्वाहा, स्वधा और निधन हैं तथा जो ऋक्, यजुष, सामवेद के स्वरूप हैं और त्रिलोकी के अधिपति हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d107-d108
 
 
श्लोक  13.14.d107-d108 
पुनर्वसुभृतत्वाय जीवप्रभविषाय च॥
वषट्काराय स्वाहायै स्वधायै निधनाय च।
ऋचे च यजुषे साम्ने त्रैलोक्यपतये नम:॥
 
 
अनुवाद
मैं भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूँ, जो पुनर्वसु नामक नक्षत्र से उत्पन्न हुए हैं और प्रत्येक प्राणी के उत्पत्ति स्थान हैं, जिनके नाम और रूप वषट्कार, स्वाहा, स्वधा और निधन हैं तथा जो ऋक्, यजुष, सामवेद के स्वरूप हैं और त्रिलोकी के अधिपति हैं।
 
I pay my respects to Lord Vishnu, who is born from the constellation named Punarvasu and is the place of origin of every living being, whose names and forms are Vashatkar, Swaha, Swadha and Nidhan and who is the form of Rik, Yajush, Samveda and is the ruler of Triloki.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)