लोकानस्मद्विधा ये च विचरन्ति यथासुखम्।
तस्मादेतानि गेहेषु रक्षोघ्नानि विशाम्पते।
एतद् व: कथितं सर्वं यत्र व: संशयो महान्॥ १२॥
अनुवाद
हम जैसे रात्रिचर प्राणी, जो समस्त लोकों में स्वतन्त्र रूप से विचरण करते हैं, उपर्युक्त गृहों को कोई हानि नहीं पहुँचा सकते; अतः हे प्रजानाथ! इन राक्षसनाशक वस्तुओं को अपने गृहों में अवश्य रखना चाहिए। जिस विषय में तुम्हें महान् संशय था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है।
The nocturnal creatures like us who roam freely in all the worlds cannot cause any harm to the above-mentioned houses; therefore, O Prajanath! These demon-killing things must be kept in your houses. I have told you all about this matter, about which you had great doubts.
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि प्रमथरहस्ये एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें प्रमथगणोंका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ एकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३१॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥