| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 135: अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन » श्लोक 32-33 |
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| | | | श्लोक 13.135.32-33  | न तेषां विषमं किंचिन्न दु:खं न च कण्टका:॥ ३२॥
उपानहौ च यो दद्यात् पात्रभूते द्विजोत्तमे।
छत्रदाने सुखां छायां लभते परलोकग:॥ ३३॥ | | | | | | अनुवाद | | जो व्यक्ति किसी श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, उसके लिए कोई कठिन परिस्थिति नहीं होती। उसे न तो कष्ट उठाना पड़ता है, न ही काँटों का सामना करना पड़ता है। छाता दान करने से दानकर्ता को परलोक जाते समय सुखद छाया प्राप्त होती है। | | | | There is no difficult situation for the one who donates a shoe to a noble and deserving Brahmin. He neither has to suffer nor face thorns. By donating an umbrella, the donor gets a pleasant shade when he goes to the next world. | | ✨ ai-generated | | |
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