श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 135: अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  13.135.3-4 
अरुन्धत्युवाच
तपोवृद्धिर्मया प्राप्ता भवतां स्मरणेन वै।
भवतां च प्रसादेन धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान्॥ ३॥
सगुह्यान् सरहस्यांश्च तान् शृणुध्वमशेषत:।
श्रद्दधाने प्रयोक्तव्या यस्य शुद्धं तथा मन:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अरुन्धती बोलीं, "हे देवताओं! आपने मेरा स्मरण किया है, इससे मेरा तप बढ़ गया है। अब आपकी कृपा से मैं रहस्यसहित सनातन धर्म का वर्णन कर रही हूँ। आप सब इसे सुनें। शुद्ध मन वाले भक्त को ही इन धर्मों का उपदेश करना चाहिए।" ॥3-4॥
 
Arundhati said, "O Gods! You have remembered me, and this has increased my penance. Now, with your kindness, I am describing the Sanatan Dharma along with its secrets. You all should listen to it. Only a devotee whose mind is pure should preach these Dharmas." ॥ 3-4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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