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mahabharat 13.132.17-18: जमदग्नि बोले - 'चाहे कोई अश्वमेध या सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करे, चाहे वृक्ष पर सिर झुकाकर लटक जाए, चाहे कोई मंगलमय यज्ञ करे; परंतु जिसका हृदय शुद्ध नहीं है, वह पापी अवश्य नरक में जाता है; क्योंकि यज्ञ, सत्य और हृदय की पवित्रता, ये सब समान हैं (फिर भी हृदय की पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ है)।॥17-18॥   |   mahabharat अध्याय 13.132: अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 132: अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  13.132.17-18 
जमदग्निरुवाच
यो यजेदश्वमेधेन वाजपेयशतेन ह।
अवाक्शिरा वा लम्बेत सत्रं वा स्फीतमाहरेत्॥ १७॥
न यस्य हृदयं शुद्धं नरकं स ध्रुवं व्रजेत्।
तुल्यं यज्ञश्च सत्यं च हृदयस्य च शुद्धता॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जमदग्नि बोले - 'चाहे कोई अश्वमेध या सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करे, चाहे वृक्ष पर सिर झुकाकर लटक जाए, चाहे कोई मंगलमय यज्ञ करे; परंतु जिसका हृदय शुद्ध नहीं है, वह पापी अवश्य नरक में जाता है; क्योंकि यज्ञ, सत्य और हृदय की पवित्रता, ये सब समान हैं (फिर भी हृदय की पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ है)।॥17-18॥
 
Jamadagni said, "One may perform Ashwamedha or hundreds of Vajpeya sacrifices, hang himself from a tree with his head down or open a prosperous sacrament; but the sinner whose heart is not pure, definitely goes to hell; because sacrifice, truth and purity of heart are all equal (yet purity of heart is the best).॥17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)