श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  13.130.25-26 
प्रविभागं तु पिण्डानां प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश:।
पिण्डो ह्यधस्ताद् गच्छंस्तु अप आविश्य भावयेत् ॥ २५॥
पिण्डं तु मध्यमं तत्र पत्नी त्वेका समश्नुते।
पिण्डस्तृतीयो यस्तेषां तं दद्याज्जातवेदसि॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अब मैं तुम्हें क्रम से पिण्डों का विभाजन बताता हूँ । श्राद्ध में बताए गए तीन पिण्डों में से पहला पिण्ड जल में विसर्जित करना चाहिए । बीच वाले पिण्ड को केवल श्राद्धकर्ता की पत्नी ही खाए और तीसरा पिण्ड अग्नि में विसर्जित कर दे ॥25-26॥
 
Now I will tell you the division of pindas in sequence. Of the three pindas prescribed in Shraddha, the first one should be immersed in water. The middle one should be eaten only by the wife of the Shraddha performer and the third one should be immersed in fire.॥25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)