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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक d3-d4
 
 
श्लोक  13.129.d3-d4 
पुण्डरीक: पुरा विप्र: पुण्यतीर्थे जपान्वित:।
नारदं परिपप्रच्छ श्रेयो योगपरं मुनिम्॥
नारदश्चाब्रवीदेनं ब्रह्मणोक्तं महात्मना॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल की कथा है, पुण्डरीक नामक एक प्रसिद्ध ब्राह्मण किसी तीर्थस्थान में सदैव जप किया करता था। उसने योगवेत्ता नारदजी से श्रेय (कल्याण का साधन) के विषय में पूछा। तब नारदजी ने उसे महात्मा ब्रह्माजी द्वारा बताए गए श्रेय का इस प्रकार उपदेश दिया।
 
It is a story of ancient times, a famous Brahmin by the name of Pundarik used to always do Japa in a holy place. He asked the Yoga-oriented sage Naradji about Shrey (means of welfare). Then Naradji preached him the Shrey told by Mahatma Brahmaji in this way.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)