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श्लोक  13.128.18 
नोत्थापयामि भर्तारं सुखसुप्तमहं सदा।
आन्तरेष्वपि कार्येषु तेन तुष्यति मे मन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जब स्वामीजी आराम से सो रहे होते थे, तो मैं उन्हें कभी नहीं जगाता था, चाहे कोई ज़रूरी काम ही क्यों न हो। इससे मुझे विशेष संतुष्टि मिलती थी।
 
‘When Swamiji was comfortably asleep, I would never wake him up even if there was some urgent work to be done. This would give me special satisfaction.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)