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mahabharat 13.128.14: जो अन्न मेरे स्वामी खाने के योग्य नहीं समझते थे, जो खाने की वस्तुएँ, भोजन या पेय उन्हें पसन्द नहीं आते थे, मैं भी उनका त्याग कर देता था॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 13.128: शाण्डिली और सुमनाका संवाद—पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.128.14 
यदन्नं नाभिजानाति यद् भोज्यं नाभिनन्दति।
भक्ष्यं वा यदि वा लेह्यं तत्सर्वं वर्जयाम्यहम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो अन्न मेरे स्वामी खाने के योग्य नहीं समझते थे, जो खाने की वस्तुएँ, भोजन या पेय उन्हें पसन्द नहीं आते थे, मैं भी उनका त्याग कर देता था॥ 14॥
 
Whatever food my master did not consider fit for consumption, whatever eatables, foods or drinks he did not like, I too used to abandon them.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)