श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 124: कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्मको प्राप्त करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.124.2 
तस्य धर्मार्थविदुषो दृष्ट्वा तद् विपुलं तप:।
आजगाम द्विजश्रेष्ठ: कृष्णद्वैपायनस्तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
तब धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले उस राजकुमार की घोर तपस्या देखकर विप्रवर श्री कृष्णद्वैपायन व्यासजी उसके पास आये॥2॥
 
Then seeing the fierce penance of that prince who knew the principles of Dharma and Artha, Vipravar Shri Krishnadvaipayan Vyasji came to him. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)