Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.123.3: हे कीट! मैं जानता हूँ, अपने पूर्व पापों के कारण तुम्हें कीट योनि में जन्म लेना पड़ा है। यदि इस समय तुम धर्म में आस्था रखोगे, तो तुम्हें अवश्य ही धर्म की प्राप्ति होगी।   |   mahabharat अध्याय 13.123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.123.3 
जानामि पापै: स्वकृतैर्गतं त्वां कीट कीटताम्।
अवाप्स्यसि पुनर्धर्मं धर्मं तु यदि मन्यसे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे कीट! मैं जानता हूँ, अपने पूर्व पापों के कारण तुम्हें कीट योनि में जन्म लेना पड़ा है। यदि इस समय तुम धर्म में आस्था रखोगे, तो तुम्हें अवश्य ही धर्म की प्राप्ति होगी।
 
Insect! I know, you have had to be born as an insect because of your past sins. If you have faith in Dharma at this time, you will definitely attain Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)